फिर अर्जुन बना जाए…

 टूटी आशाएँ,जली चिताएँ 

कुछ सच,कुछ अफवाएँ......

 

फिर से आंसुओं ने नैनो को निचोड़ा

फिर से साहस ने दम तोड़ा

 

हो चिंतामय जब आँख लगी,

टूटे-बिखरे हादसे मन मे आए ...........

 

तब फिर से................केशव मिलने सपन में चले आए..........

 

मुसकाते से लब खोले...प्रेम प्यार से यों बोले.....

हे पार्थ....समय हो गया .....

शत्रुओं से भिड़ा जाए,,,फिर से रण जीता जाए....

चलो फिर से अर्जुन बना जाए..........

 

मैं बोला....पर युद्ध बड़ा है,,,बैरी भी अब सर चढ़ा है...

कदम कदम पर मार रहा है...आपका अर्जुन हार रहा है....

 

केशव बोले.....

योद्धाओं की परख हुई है,,,सदा ही युद्ध के पैमानो से 

शत्रु को भी पता चला,,,इस बार युद्ध नहीं नादानों से

इस अनसुलझी बीमारी से इतना भी क्या डरना पार्थ.....

मेरी-तेरी जोड़ी ने तो कई युद्ध जीते हैं ज़मानों से......

 

नाराजगी भरे स्वर मे मैं बोला....

केशव तुम बड़े झूठे हो....

केशव तुम बड़े झूठे हो....

जब-जब हम रण मे जाते हैं....दो मेरे,दो तुम्हारे ....

चार पदचिन्ह नज़र आते हैं....

लेकिन.......

रण की गहराई मे....आप मुझे अकेला छोड़ जाते हैं....

पीछे देखता हूँ...तो मुझे मेरे ही दो पदचिन्ह नज़र आते हैं....

 

केशव फिर मंद-मंद मुसकाए ...लब खोले...ओर फिर बोले.....

 

फिर शंका कर रहे हो पार्थ....

चलो...ये भ्रम भी मिटा देता हूँ......सच बता देता हूँ....

वो दो पदचिन्ह मेरे होते हैं...क्यूंकी तुम्हें तो मैं गोद मे उठा लेता हूँ..........

मैंने पूछा ..........केशव....

तुम्हारे प्रेम भरे जवाब से मेरे नैन भीग रहे हैं...

मुझे अब भी दो ही पदचिन्ह दिख रहे हैं....

 

केशव बोले.....तो अब बोलो....

मेरी गोद मे बैठकर भी साहस हारोगे???

या शत्रु को मरोगे...

 

एकाएक मेरी निंद्रा खुली ........

भयमुक्त होकर मैंने हाथों को सनेटाइज़ किया

मास्क पहना....और....दिनचर्या मे चल पड़ा 

 

साहस बड़ा हो गया....शत्रु झुक चुका था 

केशव का मार्गदर्शन मिला...मैं अर्जुन बन चुका था...............

मैं अर्जुन बन चुका था.....................................

                                                                                 “गुरू”

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