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कमी सी है ,,,,

  माना कि यहाँ तेरे आगमन की एक सरगर्मी सी है, पर तेरे लौट आने तक, हर चीज़ में एक कमी सी है। तेरे कदम रखने मात्र से, खिल उठते हैं यहाँ के पेड़-पौधे, बिन तेरे तो आसमान महज़ बादल, और धरती सूखी ज़मीं सी है। चर्चा है तेरे आने की, तो धूप में भी ठंडक का अहसास होने लगा, वरना पत्तों पर जमी है धूल, और साये में भी एक नमी सी है। महज़ तेरे आने से, मेरी हर "ना" अब "हाँ" में बदल जाती है, वरना रूठे मन से तो मेरी "हाँ" में भी "ना" समझनी लाज़मी सी है। मिलन की आस में 'गुरु' ने दोस्तों की महफ़िल सजाई है, इन तैयारियों को देख, तेरे शीघ्र आने की उम्मीद मन में बनी सी है। तेरे लौट आने तक, वाकई... सब कमी सी है। माना कि यहाँ तेरे आने की एक सरगर्मी सी है, पर तेरे लौट आने तक तो सब कमी सी है। “गुरु “

मैं बुद्ध हो गया हूँ,,,main budhh ho Gaya hoon…!!

 तन-मन-धन से शुद्ध हो गया हूँ तुमसे मिला हूँ,मैं बुद्ध हो गया हूँ धर्म भुला-कर्म भुला बैठकर अंतर्मन में झूला जागकर सो रहा हूँ अधीन था, समृद्ध हो गया हूँ तुमसे मिला हूँ,मैं बुद्ध हो गया हूँ समय का ज़हर  बेअसर हो रहा है  अमृतरस अविरत बह रहा है  मैं पंचामृत बनकर  शुद्ध हो गया हूँ तुमसे मिला हूँ,मैं बुद्ध हो गया हूँ मेरे हृदय का  तेरे चरणों से आलिंगन मैंने सुबह मेरे हाथ चूमे मान तेरे चरण धुलकर प्रेम धारा में  चरणामृत सा शुद्ध हो गया हूँ तुमसे मिला हूँ,मैं बुद्ध हो गया हूँ “गुरु” ने मैं-मैं में जीवन गुजारा अंततः लिया तेरा सहारा  खुदको भूलकर मैं तुम में मिला हूँ समझ आया सार सारा  तुम में मिलकर मैं तुम हो गया हूँ  तुमसे मिला हूँ,मैं बुद्ध हो गया हूँ

मैं….मूढ़ मति

मैं ……मूर्ख अति  गूढ़…… मूढ़ मती समझ नहीं पाया समा नहीं पाया  पूर्णतः समर्पण  नहीं दे पाया  आपके प्रेम में  निर्मल जल सा  द्रवित हो जाना चाहिए था मुझे  किंतु……मैं था  कि… पिंघलकर मोम भी नहीं हो पाया  निर्मल क्या??? जल तक नहीं बन पाया…. झाँक कर  अपने अन्तर्मन में; आपके ; प्रेम भरे नयन में  मुझे हो जाना चाहिए था  शून्य ; किंतु….. मैं ख़ाली नहीं कर पाया  अपने आप को  समझ नहीं पाया  आपको न ही अपने आप को मेरे अनगिनत अवगुण फिर भी चाह; तुम…सिर्फ़ तुम…. क्षमाप्रार्थी हूँ… इस चाह के लिए करबद्ध हूँ… आपके प्रेम अथाह के लिए मुझे स्वीकार किया… पार किया… अधूरा ;अपूर्ण  समर्पण….. किंतु ;मैं खुश हूँ जितना हूँ…आपका हूँ…. अवगुण लेकर भी… मार्ग से हटा नहीं… आपका ही रहा मैं बँटा नहीं… गौरवान्वित हूँ आपको पाकर हृदय से चाहकर… स्वीकारो ; रख चरण अवगुण मेरे मैं आपका…… आप मेरे…. आप मेरे…. “गुरु चरण”

मैं चाहता हूँ…..

ऐसा हो…कि मैं द्रवित हो जाऊँ और आपके चरणों में बस जाऊँ रपट जाऊँ…समा जाऊँ…हिस्सा बन जाऊँ  चरण रज का… तुम कहीं विराजो चाहने वाले तुम्हारे दर्शरनार्थ आएँ मैं छुआ जाऊँ…उनके अश्रु भरे नेत्रों से  उनके कप-कपाते हाथों से… और कभी-कभार चूमा जाऊँ श्रद्धा भरे होंठों से…. और वो ऊर्जा तुममें मुझसे होकर संचारित हो और मैं धन्य होता रहूँ बार-बार बार-बार…बार-बार कभी-कभार गर तुम चाहो तो धोया जाए तुम्हारे चरणों को  पवित्र जल से… प्रेम विमल से… और मुझे सौभाग्य मिले चरणामृत बनने का मुझे भला कैसा संकोच मैं तो चाहता हूँ की तुम आसान जमाओ अपने चरणों को समेटकर  समाधि लगाओ मुझे भी इस तत्वज्ञान में  खोने का अवसर मिले मुझे भी : तुम होने का अवसर मिले मैं प्रतीक्षा में ही रहता हूँ तुम सत्संग सुनाना शुरू करोगे एक चरण : दूसरे के ऊपर धरोगे और घंटों भर  मुझे विश्राम दोगे… मैं चरणों को सुला दूँगा तुम्हें हँसा दूँगा… और तुम चरण आबंध खोल लोगे तुम बोलते-बोलते विश्राम लो और भजन संध्या शुरू हो  तुम्हें तुम्हारी पसंद का  कुछ सुनाया जाए  तुम्हें हंसाया जाए;नचाया जाए तुम नाचो और संग मै...

फिर अर्जुन बना जाए…

  टूटी आशाएँ , जली चिताएँ  कुछ सच , कुछ अफवाएँ......   फिर से आंसुओं ने नैनो को निचोड़ा फिर से साहस ने दम तोड़ा   हो चिंतामय जब आँख लगी , टूटे-बिखरे हादसे मन मे आए ...........   तब फिर से ............. ...केशव मिलने सपन में चले  आए..........   मुसकाते से लब खोले...प्रेम प्यार से यों बोले..... हे पार्थ....समय हो गया ..... शत्रुओं से भिड़ा जाए ,,, फिर से रण जीता जाए.... चलो  फिर  से  अर्जुन बना जाए..........   मैं बोला....पर युद्ध बड़ा है ,,, बैरी भी अब सर चढ़ा है... कदम कदम पर मार रहा है...आपका अर्जुन हार रहा है....   केशव बोले..... योद्धाओं की परख हुई है ,,, सदा ही युद्ध के पैमानो से  शत्रु को भी पता चला ,,, इस बार युद्ध नहीं नादानों से इस अनसुलझी बीमारी से इतना भी क्या डरना पार्थ..... मेरी-तेरी जोड़ी ने तो कई युद्ध जीते हैं ज़मानों से......   नाराजगी भरे स्वर मे मैं बोला.... केशव तुम बड़े झूठे हो.... केशव तुम बड़े झूठे हो.... जब-जब हम रण मे जाते हैं....दो मेरे , दो तुम्हारे .... चार पदचिन्ह नज़र आते हैं .... लेकिन....... रण की...

यकीं कीजिये...

आसां नही है...आंसू रोक पाना...यकीं कीजिये आसां नही...तुमसे दिल लगाना...यकीं कीजिये यकीं है हृदय को,मेरे बुलावे पर आए हो सताया है छः माह,मनाने अब आये हो आसां नही है...तुमसे रूठ पाना...यकीं कीजिये... मैं भागा बहुत,दीद भर को तेरी तेरी आँख-मिचौली,भीगी पलकें मेरी आसां नही है...भीगी पलकें सुखाना...यकीं कीजिये प्रेम तुमसे प्रिय,प्रसंग तुम ही रचो घर आये हो सजन ,एक बार तो दिखो आसां नही है...तुम्हे देखे बिन जी पाना...यकीं कीजिये बिन सजनिया देखो,मैं बिरहा सह रहा हूँ प्रेम मन मे समेटे,तुम्हे देखे बिन रह रहा हूँ आसां नही है... "गुरुचरण" प्रेम निभाना...यकीं कीजिये आसां नही है...तुमसे दिल लगाना...यकीं कीजिये

बिरहा यही है...

बिरहा यही है.... मैंने जो सही है...बिरहा यही है.. हमसे पूछो के ये दिन हमने कैसे सहे हैं आँखों मे आँसू लेकर,हम कैसे रहे हैं मौज-बहारें सब तुमसे जुड़ी हो जब कैसा फर्क फिर हम,जिये या मरे हैं... इंतज़ार में सब रातें कटी हैं बिरहा यही है...बिरहा यही है... तुम्हारे समय मे शामिल,क्यों मैं नही हूँ प्यारा नही हूँ,,,या तुम्हारा नही हूँ प्यारा भी हूँ गर...तुम्हारा भी हूँ गर तुम ही कहो फिर क्या,ये दूरी सही है तेरी दीद बिन  मेरी सांसे थमी हैं बिरहा यही है...बिरहा यही है... न खाना ही भाता,न पानी दिल को पचता सब कुछ वही है, पर अच्छा नही लगता खुश तो नही मैं, पर रहता हूँ हंसता तुम न मिलो तो फिर,मेरे पास है क्या बचता मन मे ललक तेरी आँखों मे छवि है बिरहा यही है....बिरहा यही है....