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मैं….मूढ़ मति

मैं ……मूर्ख अति  गूढ़…… मूढ़ मती समझ नहीं पाया समा नहीं पाया  पूर्णतः समर्पण  नहीं दे पाया  आपके प्रेम में  निर्मल जल सा  द्रवित हो जाना चाहिए था मुझे  किंतु……मैं था  कि… पिंघलकर मोम भी नहीं हो पाया  निर्मल क्या??? जल तक नहीं बन पाया…. झाँक कर  अपने अन्तर्मन में; आपके ; प्रेम भरे नयन में  मुझे हो जाना चाहिए था  शून्य ; किंतु….. मैं ख़ाली नहीं कर पाया  अपने आप को  समझ नहीं पाया  आपको न ही अपने आप को मेरे अनगिनत अवगुण फिर भी चाह; तुम…सिर्फ़ तुम…. क्षमाप्रार्थी हूँ… इस चाह के लिए करबद्ध हूँ… आपके प्रेम अथाह के लिए मुझे स्वीकार किया… पार किया… अधूरा ;अपूर्ण  समर्पण….. किंतु ;मैं खुश हूँ जितना हूँ…आपका हूँ…. अवगुण लेकर भी… मार्ग से हटा नहीं… आपका ही रहा मैं बँटा नहीं… गौरवान्वित हूँ आपको पाकर हृदय से चाहकर… स्वीकारो ; रख चरण अवगुण मेरे मैं आपका…… आप मेरे…. आप मेरे…. “गुरु चरण”

मैं चाहता हूँ…..

ऐसा हो…कि मैं द्रवित हो जाऊँ और आपके चरणों में बस जाऊँ रपट जाऊँ…समा जाऊँ…हिस्सा बन जाऊँ  चरण रज का… तुम कहीं विराजो चाहने वाले तुम्हारे दर्शरनार्थ आएँ मैं छुआ जाऊँ…उनके अश्रु भरे नेत्रों से  उनके कप-कपाते हाथों से… और कभी-कभार चूमा जाऊँ श्रद्धा भरे होंठों से…. और वो ऊर्जा तुममें मुझसे होकर संचारित हो और मैं धन्य होता रहूँ बार-बार बार-बार…बार-बार कभी-कभार गर तुम चाहो तो धोया जाए तुम्हारे चरणों को  पवित्र जल से… प्रेम विमल से… और मुझे सौभाग्य मिले चरणामृत बनने का मुझे भला कैसा संकोच मैं तो चाहता हूँ की तुम आसान जमाओ अपने चरणों को समेटकर  समाधि लगाओ मुझे भी इस तत्वज्ञान में  खोने का अवसर मिले मुझे भी : तुम होने का अवसर मिले मैं प्रतीक्षा में ही रहता हूँ तुम सत्संग सुनाना शुरू करोगे एक चरण : दूसरे के ऊपर धरोगे और घंटों भर  मुझे विश्राम दोगे… मैं चरणों को सुला दूँगा तुम्हें हँसा दूँगा… और तुम चरण आबंध खोल लोगे तुम बोलते-बोलते विश्राम लो और भजन संध्या शुरू हो  तुम्हें तुम्हारी पसंद का  कुछ सुनाया जाए  तुम्हें हंसाया जाए;नचाया जाए तुम नाचो और संग मै...