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Showing posts from May, 2016

मेरे प्रेम की डोर..

आपसे मेरे प्रेम की है डोर कुछ ऐसी प्रभु मैं प्यास तुम नीर,दोनों एक दूजे के पूरक प्रभु जब कभी मैं उदास हूँ,तुम मुझे हर्षाते हो भटके हुए इस पुत्र को,राह तुम दिखलाते हो मेरी सीरत मे तेरी कीरत,मेरी सूरत में तेरी सूरत प्रभु हैं भाव सब तुमसे जुड़े,पूर्ण प्रेम के स्वामी हो तुम हृदय सम्राट,भक्ति राह में अंतर्यामी हो तुम घट-घट में हैं झांकी तुम्हारी,तुम कुम्हार मैं मूरत प्रभु "गुरु चरण"कहे शरण में रखना,डोर मत न छोड़ना ह्रदय के सब तारों को अब प्रेम गगन में जोड़ना तुम बिन मेरा वजूद नहीं,पल पल मुझे तेरी जरूरत प्रभु आपसे मेरे प्रेम की है डोर कुछ ऐसी प्रभु मैं प्यास तुम नीर,दोनों एक दूजे के पूरक प्रभु

मेरे अपने सात समन्दर..

रेत में ही घुल जाते हैं मेरे अपने सात समन्दर आकर मुझमे मिल जाते हैं मेरे सात समन्दर बनकर पर्वत सी उठती है फिर पत्ते सी गिर जाती है हवा सी बनकर चलती है,आकर गले लग जाती है तेज़ वेग से चलती है धारा मेरे अंदर आकर मुझमे मिल जाते हैं,मेरे साथ समन्दर...।। खिल खिल कर मुस्काता है,बन जाता मस्त कलन्दर जीत के दस दरवाजों को बनता सम्राट सिकन्दर जीती जिभ्या,आँख,कान,जीता दिल देवेन्द्र आकर मुझमे मिल जाते हैं,मेरे साथ समन्दर...।। दसो दिशाएं देख ली,सुन लिए सात सुरेन्द्र ब्रह्माण्ड पर नज़र फिरा दी,देख लिया जब अंदर ज्योत जगे,शंख बजे,प्रभु सजे,स्वयं हूँ एक मन्दिर आकर मुझमे मिल जाते हैं,मेरे साथ समन्दर...।।