मैं चाहता हूँ…..
ऐसा हो…कि मैं द्रवित हो जाऊँ और आपके चरणों में बस जाऊँ रपट जाऊँ…समा जाऊँ…हिस्सा बन जाऊँ चरण रज का… तुम कहीं विराजो चाहने वाले तुम्हारे दर्शरनार्थ आएँ मैं छुआ जाऊँ…उनके अश्रु भरे नेत्रों से उनके कप-कपाते हाथों से… और कभी-कभार चूमा जाऊँ श्रद्धा भरे होंठों से…. और वो ऊर्जा तुममें मुझसे होकर संचारित हो और मैं धन्य होता रहूँ बार-बार बार-बार…बार-बार कभी-कभार गर तुम चाहो तो धोया जाए तुम्हारे चरणों को पवित्र जल से… प्रेम विमल से… और मुझे सौभाग्य मिले चरणामृत बनने का मुझे भला कैसा संकोच मैं तो चाहता हूँ की तुम आसान जमाओ अपने चरणों को समेटकर समाधि लगाओ मुझे भी इस तत्वज्ञान में खोने का अवसर मिले मुझे भी : तुम होने का अवसर मिले मैं प्रतीक्षा में ही रहता हूँ तुम सत्संग सुनाना शुरू करोगे एक चरण : दूसरे के ऊपर धरोगे और घंटों भर मुझे विश्राम दोगे… मैं चरणों को सुला दूँगा तुम्हें हँसा दूँगा… और तुम चरण आबंध खोल लोगे तुम बोलते-बोलते विश्राम लो और भजन संध्या शुरू हो तुम्हें तुम्हारी पसंद का कुछ सुनाया जाए तुम्हें हंसाया जाए;नचाया जाए तुम नाचो और संग मै...